अफ्तार अहमद फर्स्ट एडिटर न्यूज़ सुल्तानपुर
ईद-उल-अजहा पर प्रतिबंधित जानवरों, खुले में कुर्बानी से बचें
ईद-उल-अजहा (बकरीद) से पहले जामे अरबिया खैराबाद के प्रिंसिपल मौलाना मोहम्मद अहमद वारसी ने एक महत्वपूर्ण वीडियो बयान जारी किया है। उन्होंने समाज से त्योहार को आपसी सौहार्द, साफ-सफाई और दूसरों की सहूलियत का ध्यान रखते हुए मनाने की अपील की।
मौलाना वारसी ने कुर्बानी के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि यह एक पवित्र इबादत है, जो केवल जानवर की कुर्बानी तक सीमित नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि इबादत का अर्थ दूसरों के चूल्हों को रोशन करने के बारे में सोचना है। उन्होंने कहा कि सबसे पहले हमें अपने अंदर के झूठ, गीबत (पीठ पीछे बुराई करना), हसद (ईर्ष्या) और घमंड जैसी बुराइयों की कुर्बानी देनी होगी।
उन्होंने कानूनी और सामाजिक नियमों का पालन करने की भी हिदायत दी। मौलाना वारसी ने कहा कि सरकार द्वारा प्रतिबंधित जानवरों की कुर्बानी से पूरी तरह परहेज किया जाए। उन्होंने स्पष्ट किया कि कुर्बानी खुले में नहीं, बल्कि हमेशा परदे में ही की जानी चाहिए।
त्योहार के दौरान स्वच्छता बनाए रखने पर विशेष जोर देते हुए उन्होंने आसपास की साफ-सफाई का खास ख्याल रखने को कहा। कुर्बानी के बाद निकलने वाली गंदगी और अवशेषों को खुले में न फेंकने की अपील की गई। उन्होंने निर्देश दिया कि सभी अवशेषों को नगर पालिका द्वारा निर्धारित डस्टबिन में ही डाला जाए। मौलाना वारसी ने कहा कि यह त्योहार मोहब्बत और इंसानियत की मिसाल है, इसलिए किसी भी कार्य से पड़ोसी या देशवासियों को कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए।
सड़क पर नमाज पढ़ने के सवाल पर उन्होंने इसे पूरी तरह अनुचित बताया। मौलाना वारसी ने कहा कि इबादत का अर्थ है किसी को कोई तकलीफ या परेशानी न हो। सड़क पर नमाज पढ़ने से आवागमन बाधित होता है, ट्रैफिक में दिक्कत आती है और बीमार व परेशान लोगों को असुविधा होती है। उन्होंने सलाह दी कि नमाज मस्जिदों और ईदगाहों में ही पढ़ी जानी चाहिए।
उन्होंने पैगंबर मोहम्मद साहब की हदीस का हवाला देते हुए अपनी बात समाप्त की: “सच्चा मुसलमान वही है जिसकी जुबान और हाथ से दूसरा मुसलमान (

इंसान) महफूज रहे।”